क्या है अधिक मास

अधिक मास पर काफी विवेचन किया गया है। ज्योतिष गणित में सूक्ष्म विवेचन करने के बाद यह स्वीकार किया है कि जिस चन्द्रमास में सूर्य का स्पष्ट गति प्रमाणानुसार संक्रमण ना हो वह अधिक मास कहलाता है तथा जिसमें दोबारा राषि संक्रमण हो उसे क्षय मास करते हैं। षास्त्रविदों ने विभिन्न अधिक मासों की अलग अलग फलश्रुति दी है।

अधिक मास चुॅंकि साल का तेरहवाॅं माह है इसे अधिक मास कहा गया है तथा भगवान विष्णु ने इसे अपनाया इस कारण इसका नाम पुरुषोत्तम मास भी है। परन्तु इसे मल मास क्यों कहा गया है इसका कारण है षकुनि, चतुष्पद, नाग एवं किंस्तुघ्न ने चार करण रवि का मल माने जाते हैं, इसलिए उनकी संक्रंाति से जुड़े होने के कारण वह माह मल मास कहलाता है।

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मल मास के दौरान जनेउ संस्कार, षादी एवं यज्ञ प्रधान उत्सव ना करें। इस माह ईष्वर की आराधना, ब्रहमम मुहूर्त में उठकर स्नान दान एवं पुण्यक्रियाएॅं करना एवं षास्त्रों का श्रवण करना एवं दैनिक जीवन धर्ममय बनाए रखने का उल्लेख भविष्योत्तर पुराण में किया गया है।

यदि अधिक मास चैत्र माह में पड़े तो धरती पर वस्तुओं की सुलभता एवं लोगों के आरोग्य की रक्षा एवं अनुकूल वर्षा के योग माने जाते हैं।

ठसी प्रकार यदि वैसाख मास में अधिक मास हो तो संसार के लोग सुखी होते हैं, अच्छी वर्षा के कारण धन धान्य में उत्तम वृद्धि होने के योग बनते हैं। इस प्रकार विभिन्न मास में अधिक मास के आने के अलग अलग प्रभाव होते हैं।

पुरुषोत्तम मास कथा श्रवण के माहात्म्य को लाभदायक बनाने हेतु व्यक्ति को पुरुषोत्तम मास में अपना आचरण अति पवित्र एवं मनोनिग्रह के साथ प्राणी मात्र से चरित्र को उजागर करने वाला सदव्यवहार करना चाहिए।

इस माह दान का महत्व अत्याधिक है।

अधिक मास में आने वाली षुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष की एकादषी पद्मिनी एवं परमा एकादषी कहलाती है, जो इष्ट फलदायिनी, वैभव एवं कीर्ति में वृद्धि करती है एवं मनोइच्छा पूर्ण कर उपवासी नर-नारी को चिंता मुक्त जीवन प्रदान करने में सहायता करती है।

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Created: Saturday, May 23 2015
Author: Lokesh Jagirdar

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